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क्यूम्युलेटिव या नॉन-क्यूम्युलेटिव FD: हर महीने ब्याज लें या मैच्योरिटी पर?

बैंक वही, रेट वही, बस पेआउट का खाना अलग। क्यूम्युलेटिव और मंथली या क्वार्टरली पेआउट FD रुपयों में असल में कितना देती हैं, मंथली का आंकड़ा थोड़ा कम क्यों होता है, और आपके लिए कौन सी सही है।

₹10 लाख की FD पर 6.5% से 5 साल का कुल ब्याज दिखाता बार चार्ट: क्यूम्युलेटिव ₹3.80 लाख, क्वार्टरली पेआउट ₹3.25 लाख, मंथली पेआउट ₹3.23 लाख
₹10 लाख, 6.5%, 5 साल: पेआउट ऑप्शन के हिसाब से कुल ब्याज, टैक्स से पहले।

FD बनवाते समय बैंक के फॉर्म में एक छोटा सा खाना होता है, जिस पर ज्यादातर लोग बिना सोचे टिक लगा देते हैं: "ब्याज का भुगतान"। क्यूम्युलेटिव, मंथली, क्वार्टरली। बैंक वाले भैया पूछते हैं "पेआउट चाहिए या मैच्योरिटी पे?" और आगे बढ़ जाते हैं। यही एक टिक तय करता है कि ₹10 लाख पर पांच साल में आपको ₹3.80 लाख मिलेंगे या ₹3.25 लाख, वो भी उसी रेट पर, उसी बैंक में।

दोनों में कोई चालाकी नहीं है। दोनों का काम अलग है, और ₹55,000 का फर्क तभी चुभता है जब पैसा जिस तरह इस्तेमाल होना है, उससे मेल न खाने वाला खाना टिक हो जाए। तो नीचे देखते हैं दोनों कैसे काम करते हैं, मंथली वाला आंकड़ा उम्मीद से थोड़ा कम क्यों आता है, और टैक्स दोनों में क्या करता है। आखिर में यही फॉर्म दो बिल्कुल अलग परिवारों के लिए भरकर दिखाया है।

ब्याज भुगतान वाला खाना असल में क्या बदलता है

क्यूम्युलेटिव FD (SBI इसे Reinvestment Plan कहता है, दूसरे बैंक "रीइन्वेस्टमेंट डिपॉजिट") बीच में आपको कुछ नहीं देती। हर तिमाही बैंक आपका ब्याज निकालता है और उसे डिपॉजिट में ही जोड़ देता है। अगली तिमाही ब्याज उस बढ़ी हुई रकम पर लगता है। मैच्योरिटी पर एक साथ पूरी रकम मिलती है: मूल रकम और सारा जुड़ा हुआ ब्याज।

नॉन-क्यूम्युलेटिव FD यानी पेआउट FD में ब्याज जैसे-जैसे बनता है, आपके सेविंग्स खाते में आता रहता है: हर महीने, हर तीन महीने, छह महीने या साल में एक बार, जो आप चुनें। डिपॉजिट खुद कभी नहीं बढ़ता। ₹10 लाख डाले तो आखिर में ठीक ₹10 लाख ही वापस मिलेंगे, ब्याज तो बीच-बीच में मिल चुका होगा।

बैंक वही, रेट कार्ड वही, सुरक्षा वही। फर्क सिर्फ इतना है कि ब्याज बनने के बाद उसका क्या होता है।

पेआउट कैसे मिलता है, और मंथली में थोड़ा कम क्यों

भारत में बैंक आमतौर पर FD का ब्याज हर तिमाही जोड़ते हैं। इसलिए क्वार्टरली पेआउट सबसे "सीधा" वाला ऑप्शन है: बैंक तिमाही का ब्याज वापस जोड़ने के बजाय आपको दे देता है। ₹10 लाख पर 6.5% हो तो ₹10,00,000 × 6.5% ÷ 4 = हर तिमाही ₹16,250। FD कैलकुलेटर में अवधि 0.25 साल डालेंगे तो यही आंकड़ा दिखेगा।

उलझन मंथली पेआउट में होती है। 6.5% को 12 से भाग दें तो ₹5,417 महीना बनना चाहिए। बैंक देता है करीब ₹5,388। SBI के अपने फिक्स्ड डिपॉजिट वाले पेज पर साफ लिखा है कि मंथली ब्याज "डिस्काउंटेड रेट" पर मिलता है।

वजह ठीक है, कोई धोखा नहीं। अगर बैंक हर महीने ₹5,417 देता, तो तिमाही के आखिर तक आपके पास ₹16,250 आ जाते, पर उसका कुछ हिस्सा एक-दो महीने पहले मिल जाता। जो पैसा पहले हाथ में आए, उसकी कीमत ज्यादा होती है। इसलिए बैंक वो मंथली रकम निकालता है जो तिमाही के आखिर में मिलने वाले ₹16,250 के बराबर बैठे। आमतौर पर हिसाब ऐसे होता है:

मंथली ब्याज = डिपॉजिट × ((1 + r ÷ 4)1/3 − 1)

6.5% पर ₹10 लाख का ये ₹5,387.59 महीना बनता है, यानी 6.5% की जगह मानो 6.47% सालाना, हर महीने मिल रहा है। ICICI बैंक के अपने उदाहरण में ₹1 लाख पर 6.60% से ₹550 की जगह ₹547 महीना दिखता है, वो भी इसी फॉर्मूले से आता है। राउंडिंग की वजह से आपके बैंक का आंकड़ा एक-दो रुपये ऊपर-नीचे हो सकता है।

कुछ बैंक और NBFC मंथली ऑप्शन के लिए रेट कार्ड पर अलग, थोड़ा कम रेट छापते हैं; कुछ बस "डिस्काउंटेड वैल्यू" लिख देते हैं। दोनों हालत में असली रुपये वाला पेआउट मिलाइए।

₹10 लाख, 5 साल: किस ऑप्शन में कितना

मान लीजिए ₹10 लाख किसी बड़े बैंक में 6.5% पर पांच साल के लिए रखे। (बड़े बैंक अभी करीब 6–6.5% दे रहे हैं, स्मॉल फाइनेंस बैंक 7–8% के आसपास। RBI ने 7 अक्टूबर 2026 को रेपो रेट बढ़ाकर 5.50% किया है, तो रेट थोड़े ऊपर जा सकते हैं। ताजा रेट कार्ड देख लीजिए।)

ऑप्शनक्या मिलता है5 साल का कुल ब्याजमैच्योरिटी पर
क्यूम्युलेटिवआखिर तक कुछ नहीं₹3,80,420₹13,80,420
क्वार्टरली पेआउटहर तिमाही ₹16,250₹3,25,000₹10,00,000
मंथली पेआउटहर महीने करीब ₹5,388करीब ₹3,23,256₹10,00,000

क्यूम्युलेटिव वाला आंकड़ा सीधे FD कैलकुलेटर से है: मैच्योरिटी पर ₹13,80,420, यानी सालाना 6.66% का असली रिटर्न (इफेक्टिव यील्ड)। पेआउट वाले आंकड़े सीधा गुणा हैं (₹16,250 की 20 तिमाहियां, या ₹5,387.59 के 60 महीने)। इसी इफेक्टिव यील्ड की वजह से बैंकों की तुलना सिर्फ बड़े अक्षरों वाले रेट से करना धोखा दे सकता है: 7% तिमाही कंपाउंडिंग पर असल में 7.19% सालाना बैठता है, और एक जैसे रेट वाले दो कार्ड कंपाउंडिंग और पेआउट की शर्तों से अलग-अलग पैसा दे सकते हैं।

इसे दस साल कर दीजिए तो क्यूम्युलेटिव FD ₹9,05,559 ब्याज देती है, और क्वार्टरली पेआउट ₹6,50,000। करीब ₹2.56 लाख का फर्क। समय के साथ कंपाउंडिंग का असर और तेज होता जाता है।

छोटी रकम के लिए, हर ₹1 लाख पर 6.5% से: करीब ₹539 महीना, ₹1,625 तिमाही, या क्यूम्युलेटिव में पांच साल बाद ₹1,38,042।

₹55,000 का फर्क असल में कहां से आता है

टेबल देखकर लगता है कि पेआउट FD में ₹55,420 का "नुकसान" है। ऐसा नहीं है। ये फर्क ब्याज पर ब्याज का है, और ये तभी गायब होता है जब आपका पेआउट गायब हो जाए।

जांच कर लेते हैं। हर तिमाही के ₹16,250 को तुरंत फिर से 6.5% पर, तिमाही कंपाउंडिंग से लगा दीजिए। पांच साल बाद कुल ₹3,80,420 बनते हैं, बिल्कुल उतना जितना क्यूम्युलेटिव FD देती है। मंथली के ₹5,387.59 को उसके मंथली वाले रेट पर लगाएं तो भी वही ₹3,80,420 आता है। मतलब पेआउट ऑप्शन के लिए बैंक आपसे कुछ नहीं काट रहा। क्यूम्युलेटिव FD बस एक पेआउट FD है जिसमें दोबारा निवेश का काम बैंक खुद, पूरे FD रेट पर, अपने आप कर देता है।

अब असली जिंदगी वाली बात। ज्यादातर लोगों का पेआउट सेविंग्स खाते में आता है और वहीं पड़ा रहता है। SBI सेविंग्स पर 2.5% देता है। वो तिमाही वाले पेआउट पांच साल सेविंग्स में पड़े रहें तो करीब ₹3,45,000 बनते हैं, यानी क्यूम्युलेटिव FD से करीब ₹35,000 कम। और अगर पैसा इधर-उधर के खर्चों में निकल गया, तो हाथ में कुछ भी एक्स्ट्रा नहीं बचता।

तो सवाल ये नहीं कि "कौन ज्यादा देता है"। सवाल ये है कि "क्या मैं ब्याज सच में इस्तेमाल करूंगा या दोबारा लगाऊंगा?" हां, तो पेआउट में आपका कुछ नहीं जाता। अगर वो सेविंग्स में पड़ा रहेगा, तो क्यूम्युलेटिव बेहतर है।

टैक्स और TDS: रेट वही, बस टाइमिंग अलग

आपने कौन सा खाना टिक किया, टैक्स को इससे फर्क नहीं पड़ता। FD का ब्याज आपकी इनकम में जुड़ता है और हर साल आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है। पेआउट FD में ये बात समझ आती है, क्योंकि पैसा खाते में आता है। क्यूम्युलेटिव FD में लोग मान लेते हैं कि टैक्स सिर्फ मैच्योरिटी पर लगेगा। ऐसा नहीं है। ब्याज जैसे-जैसे बनता है, हर साल टैक्सेबल है, भले ही आखिर तक हाथ में कुछ न आए। बैंक ये जुड़ा हुआ ब्याज वैसे भी रिपोर्ट करता है, इसलिए ये हर साल आपके AIS में दिखता है। "अभी तो मिला ही नहीं" सोचकर ITR में न दिखाएं, तो बस आंकड़े मेल नहीं खाएंगे।

30% स्लैब में (सेस मिलाकर 31.2%), क्यूम्युलेटिव के ₹3,80,420 ब्याज पर पांच साल में करीब ₹1,18,691 टैक्स बनता है। पेआउट FD के ₹3,25,000 पर ₹1,01,400। रेट वही है। क्यूम्युलेटिव में टैक्स ज्यादा सिर्फ इसलिए है क्योंकि ब्याज ज्यादा बना। कम स्लैब वाले रिटायर्ड व्यक्ति के लिए, या जिनका टैक्स बनता ही नहीं, ये मुद्दा लगभग खत्म हो जाता है। अपना स्लैब इनकम टैक्स कैलकुलेटर पर देख लीजिए।

TDS दोनों में एक जैसा है: एक बैंक से साल का ब्याज ₹50,000 पार होते ही बैंक 10% काटता है, सीनियर सिटिजन के लिए ये लिमिट ₹1 लाख है (इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 का सेक्शन 393)। PAN न हो तो 20%। क्यूम्युलेटिव FD में बैंक हर साल जुड़े ब्याज पर TDS निकालता है, इसलिए मैच्योरिटी की रकम कैलकुलेटर से थोड़ी कम आ सकती है।

एक बात और जान लीजिए। क्यूम्युलेटिव FD का ब्याज हर साल बढ़ता है, क्योंकि वो बढ़ी हुई रकम पर बनता है। पेआउट का ब्याज हर साल बराबर रहता है। मान लीजिए किसी सीनियर सिटिजन ने ₹14 लाख 7% पर रखे। पेआउट FD में साल का ₹98,000 मिलता है, ₹1 लाख की लिमिट से नीचे, तो TDS नहीं। क्यूम्युलेटिव में पहले ही साल ₹1,00,603 ब्याज जुड़ जाता है, और उसके बाद और ज्यादा, तो TDS कट जाता है। TDS कोई एक्स्ट्रा टैक्स नहीं है, ITR में एडजस्ट हो जाता है, पर जिनका टैक्स बनता ही नहीं उनके लिए ये बेकार का झंझट है।

अगर साल का आपका कुल टैक्स जीरो बनता है, तो टैक्स साल की शुरुआत में बैंक को फॉर्म 121 दे दीजिए। 1 अप्रैल 2026 से इसने फॉर्म 15G और 15H की जगह ली है। सीनियर सिटिजन के लिए बस टैक्स जीरो होना चाहिए; 60 से कम उम्र वालों के लिए ऐसी इनकम बेसिक छूट की लिमिट के अंदर भी होनी चाहिए। इनकम टैक्स विभाग के फॉर्म 121 FAQ में पूरी बात है। इस पर विस्तार से हमारी पोस्ट FD ब्याज पर टैक्स, TDS और फॉर्म 121 में पढ़िए।

दोनों में क्या छोड़ना पड़ता है

क्यूम्युलेटिव FDपेआउट FD (मंथली / क्वार्टरली)
आखिर में कुल पैसासबसे ज्यादा, क्योंकि ब्याज FD रेट पर कंपाउंड होता हैकम, जब तक आप हर पेआउट खुद दोबारा न लगाएं
नियमित इनकमकोई नहींहर महीने या तिमाही तय रकम
मेहनतकुछ नहीं, कंपाउंडिंग बैंक करता हैथोड़ी, अगर ब्याज दोबारा लगाना है
रेटपूरा रेट, तिमाही कंपाउंडिंगक्वार्टरली में पूरा रेट; मंथली में थोड़ा डिस्काउंट
टैक्सहर साल स्लैब रेट से, भले ही कुछ हाथ में न आएहर साल स्लैब रेट से, जैसे-जैसे मिले
TDSब्याज हर साल बढ़ता है, तो आगे चलकर लिमिट पार हो सकती हैहर साल बराबर ब्याज, अंदाजा लगाना आसान
महंगाईकम से कम रकम तो बढ़ती हैइनकम वहीं की वहीं, दाम बढ़ते रहते हैं

आखिरी लाइन पर थोड़ा रुकिए। आज ₹5,388 महीना ठीक-ठाक लगता है। 5% महंगाई मानें तो पांच साल बाद इससे उतना ही आएगा जितना आज करीब ₹4,220 में आता है। डिपॉजिट नहीं बढ़ता, तो इनकम भी नहीं बढ़ती। जो रिटायर्ड व्यक्ति सिर्फ पेआउट FD पर चल रहा है, वो हर साल थोड़ा-थोड़ा गरीब होता जाता है।

क्यूम्युलेटिव का नुकसान सीधा है: FD तोड़े बिना पैसा हाथ में नहीं आता, और तोड़ने पर ज्यादातर बैंक रेट में 0.5–1% कटौती करते हैं। पेआउट FD समय से पहले तोड़ने पर भी यही पेनल्टी है, और जो ब्याज ऊंचे रेट पर पहले मिल चुका है, बैंक उसे एडजस्ट कर लेता है। और बीच में मन बदलने की उम्मीद मत रखिए। पेआउट ऑप्शन आमतौर पर FD बनवाते समय ही तय हो जाता है, और बदलने का मतलब FD तोड़ना और वही पेनल्टी हो सकता है, इसलिए साइन करने से पहले बैंक से पूछ लीजिए।

लक्ष्य का पैसा, सैलरी का पैसा, पेंशन का पैसा

तय करने का सबसे आसान तरीका: पूछिए कि इस पैसे का काम क्या है।

किसी लक्ष्य का पैसा है, जैसे दो साल में कार, बच्चे का स्कूल एडमिशन या घर का डाउन पेमेंट, तो क्यूम्युलेटिव टिक कीजिए। अभी ब्याज की जरूरत नहीं, और ये बिना कुछ किए पूरे रेट पर कंपाउंड होता रहता है।

सैलरी आ रही है तो भी लगभग हमेशा क्यूम्युलेटिव ही बेहतर है। सैलरी के ऊपर आने वाला मंथली पेआउट अक्सर रोज के खर्च में घुल जाता है। अगर असल में हर महीने पैसा अलग रखने की आदत डालनी है, तो ये काम किसी भी पेआउट FD से बेहतर RD करती है।

पेंशन का पैसा है तो पेआउट वाला खाना ही पूरी बात है। बिल हर महीने आते हैं तो मंथली, और क्वार्टरली से काम चल जाए तो क्वार्टरली, क्योंकि उसमें पूरा रेट मिलता है। माता-पिता या सास-ससुर का खर्च आप उठाते हैं तो भी यही बात: उनके नाम पर मंथली पेआउट FD छोटी पेंशन की तरह काम करती है। उनका ब्याज टैक्स-फ्री लिमिट के अंदर रखिए, और टैक्स जीरो हो तो हर बैंक में फॉर्म 121 दे दीजिए, वरना बैंक TDS काट लेता है जिसे फिर ITR भरकर वापस लेना पड़ता है।

जो पैसा किसी भी दिन चाहिए, उसकी बात अलग है। उसके लिए सेविंग्स खाते से जुड़ी स्वीप-इन FD दोनों खानों से बेहतर है: ब्याज FD वाला मिलता है, और जिस दिन चाहिए उस दिन पैसा निकल जाता है।

हर महीने कितना चाहिए, वहां से उल्टा हिसाब

अगर FD को पेंशन की तरह इस्तेमाल करना है, तो पहले देखिए हर महीने कितना चाहिए, फिर उल्टा हिसाब लगाइए। डिस्काउंटेड मंथली फॉर्मूले से:

FD रेटहर ₹1 लाख पर मंथली पेआउट₹25,000 महीने के लिए कितना डिपॉजिट
6.5%करीब ₹539करीब ₹46.4 लाख
7.0%करीब ₹580करीब ₹43.1 लाख
7.5%करीब ₹621करीब ₹40.2 लाख

कुछ काम की बातें:

  • अलग-अलग बैंकों में बांटिए। DICGC हर बैंक में एक जमाकर्ता के ₹5 लाख तक का बीमा देता है, मूल रकम और ब्याज मिलाकर। एक ही बैंक में ₹45 लाख मतलब ₹40 लाख बिना बीमे के। स्मॉल फाइनेंस बैंक का 0.25% ज्यादा रेट लेना है तो वहां आपकी कुल रकम ₹5 लाख से नीचे रखिए।
  • मैच्योरिटी आगे-पीछे रखिए। पैसे को ऐसी FD में बांटिए जो अलग-अलग साल में मैच्योर हों, ताकि रेट गिरे तो पूरी रकम पर एक साथ असर न पड़े।
  • बैंक FD के अलावा भी देखिए। पोस्ट ऑफिस मंथली इनकम स्कीम 7.4% हर महीने देती है (सिंगल में ₹9 लाख, जॉइंट में ₹15 लाख तक), और सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम अक्टूबर–दिसंबर 2026 के लिए 8.2% देती है, ब्याज हर तिमाही। बैंक FD में भी सीनियर सिटिजन को करीब 0.5% ज्यादा मिलता है। हमारी पोस्ट सीनियर सिटिजन के लिए FD में इनकी तुलना है।
  • बढ़ते खर्च का भी सोचिए। 20–25 साल के रिटायरमेंट में बराबर FD इनकम पीछे छूट जाती है। कुछ लोग एक हिस्सा म्यूचुअल फंड में रखकर SWP से निकालते हैं; SWP कैलकुलेटर बताता है ऐसा पेआउट कितने साल चलेगा, और रिटायरमेंट कैलकुलेटर बताता है कितना फंड चाहिए।

दो परिवार, एक ही बैंक काउंटर, उल्टे खाने

मान लीजिए एक ही सुबह एक ही ब्रांच में दो परिवार FD बनवाने आए। पहला है एक रिटायर्ड दंपति, दोनों 60 पार, ग्रेच्युटी, PF और पुरानी बचत मिलाकर ₹50 लाख। घर करीब ₹25,000 महीने में चलता है। सीनियर वाले 7% रेट पर, ऊपर की टेबल कहती है कि इसके लिए मंथली पेआउट में करीब ₹43.1 लाख चाहिए। तो करीब ₹43 लाख की FD पर वो मंथली टिक करते हैं। अगर तीन महीने में एक बार पैसा आने से काम चल जाता, तो क्वार्टरली में इसी रकम पर करीब ₹145 महीना ज्यादा मिलता। पर बिजली का बिल, कामवाली की तनख्वाह और दवाइयां, सब हर महीने आते हैं, और ज्यादातर रिटायर्ड घरों के लिए इस सुविधा के बदले इतना छोटा फर्क ठीक है।

बाकी ₹7 लाख क्यूम्युलेटिव वाले खाने पर टिक करके रखे जाते हैं। 7% पर पांच साल में ये करीब ₹9.9 लाख हो जाते हैं। पहले वाली टेबल की महंगाई वाली लाइन का यही जवाब है: 5% महंगाई में पांच साल बाद ₹25,000 में उतना ही आएगा जितना आज करीब ₹19,600 में आता है। जब वो दिन आए, तब मंथली इनकम की कमी यही क्यूम्युलेटिव FD पूरी करेगी, या अस्पताल का बिल भरेगी।

इनके लिए खाने से ज्यादा कागजी काम मायने रखता है। वो डिपॉजिट दोनों के नाम पर और दो-तीन बैंकों में बांट देते हैं। ₹1 लाख की TDS लिमिट एक बैंक के सारे ब्याज पर गिनी जाती है, पेआउट और क्यूम्युलेटिव मिलाकर, और क्यूम्युलेटिव वाला हिस्सा हर साल बढ़ता है। ₹43 लाख 7% पर साल में करीब ₹3 लाख ब्याज देते हैं, तो दो नाम और तीन बैंकों में बंटने पर किसी एक बैंक में दोनों में से किसी का ब्याज ₹1 लाख पार नहीं करना चाहिए। साल का कुल टैक्स जीरो बनता हो तो टैक्स साल की शुरुआत में हर बैंक में फॉर्म 121 दे दें।

दूसरा है 35 साल का एक बंदा, 30% स्लैब में, जिसे अभी ₹3 लाख बोनस मिला है और तीन साल बाद कार के डाउन पेमेंट के लिए रखना है। सैलरी तो आ ही रही है, तो हर महीने सेविंग्स में ₹1,616 और आएं, इसका उसे कोई काम नहीं, और 6.5% पर मंथली पेआउट इतना ही देता। वो क्यूम्युलेटिव टिक करता है, और 6.5% पर तीन साल में मैच्योरिटी पर ₹3,64,022 मिलते हैं।

उसका एक ही काम है: ITR। तीन साल में ब्याज करीब ₹19,980, ₹21,311 और ₹22,731 जुड़ता है। हर साल ये ₹50,000 की TDS लिमिट से नीचे है, तो बैंक कुछ नहीं काटता, और ठीक तभी लोग भूल जाते हैं। फिर भी ये हर साल टैक्सेबल है, 31.2% पर तीन साल में कुल करीब ₹20,000 टैक्स, और वो दिखाए या न दिखाए, उसके AIS में तो दिखेगा ही। अगर बोनस पांच या उससे ज्यादा साल बाद के काम के लिए होता, तो FD से आगे भी देखना चाहिए, और उसके लिए हमारी SIP vs FD वाली तुलना अच्छी शुरुआत है।

बैंक वही, रेट कार्ड वही, खाने उल्टे, और दोनों सही। साइन करने से पहले दोनों को काउंटर से रुपयों में पक्का आंकड़ा मांगना चाहिए, मंथली पेआउट या मैच्योरिटी की रकम, और उसे FD कैलकुलेटर से मिला लेना चाहिए। राउंडिंग के एक-दो रुपये से ज्यादा फर्क हो, तो पैसा खाते से जाने से पहले वजह पूछ लीजिए।

लोग अक्सर पूछते हैं

क्यूम्युलेटिव और नॉन-क्यूम्युलेटिव FD में क्या फर्क है?

क्यूम्युलेटिव FD में बैंक हर तिमाही आपका ब्याज डिपॉजिट में जोड़ता जाता है और सब कुछ मैच्योरिटी पर देता है। नॉन-क्यूम्युलेटिव (पेआउट) FD में ब्याज हर महीने, तिमाही, छमाही या साल में सेविंग्स खाते में आता है, और आखिर में सिर्फ मूल रकम वापस मिलती है। दोनों का रेट कार्ड आमतौर पर एक ही होता है।

क्यूम्युलेटिव FD अच्छी है या नॉन-क्यूम्युलेटिव?

अभी ब्याज की जरूरत नहीं है तो क्यूम्युलेटिव बेहतर है, क्योंकि ये बिना कुछ किए पूरे FD रेट पर कंपाउंड होती है। ₹10 लाख 6.5% पर 5 साल के लिए क्यूम्युलेटिव में ₹3,80,420 ब्याज देते हैं, क्वार्टरली पेआउट में ₹3,25,000। नियमित इनकम चाहिए, जैसे रिटायर्ड व्यक्ति को महीने के बिल भरने हों, तो पेआउट FD सही है।

मंथली पेआउट FD में ब्याज थोड़ा कम क्यों मिलता है?

बैंक तिमाही कंपाउंडिंग करते हैं, और मंथली में कुछ पैसा पहले मिल जाता है, इसलिए मंथली रकम को डिस्काउंट करके तिमाही ब्याज के बराबर किया जाता है। ₹10 लाख पर 6.5% से ₹5,417 की जगह करीब ₹5,388 महीना मिलता है। ये कोई चार्ज नहीं है; क्वार्टरली पेआउट में पूरा रेट मिलता है।

₹10 लाख की FD पर हर महीने कितना ब्याज मिलेगा?

6.5% पर करीब ₹5,388 महीना, या ₹16,250 हर तिमाही। 7% पर करीब ₹5,800 महीना। रेट बैंक और उम्र के हिसाब से अलग होते हैं, और सीनियर सिटिजन को आमतौर पर करीब 0.5% ज्यादा मिलता है, तो बैंक का ताजा रेट कार्ड देख लीजिए।

क्यूम्युलेटिव और नॉन-क्यूम्युलेटिव FD पर टैक्स अलग लगता है?

नहीं। दोनों के ब्याज पर हर साल आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है। क्यूम्युलेटिव FD में ब्याज भले मैच्योरिटी पर मिले, वो हर साल जैसे-जैसे बनता है टैक्सेबल है, इसलिए हर साल के ITR में दिखाइए।

क्यूम्युलेटिव FD में मैच्योरिटी से पहले TDS कटता है?

हां। एक बैंक से साल का जुड़ा ब्याज ₹50,000 पार होते ही (सीनियर सिटिजन के लिए ₹1 लाख) बैंक TDS काटता है। क्यूम्युलेटिव का ब्याज हर साल बढ़ता है, तो पहले साल लिमिट से नीचे हो तब भी बाद के सालों में पार हो सकता है। टैक्स जीरो हो तो फॉर्म 121 दीजिए, जिसने 1 अप्रैल 2026 से 15G और 15H की जगह ली है।

यह लेख Gainly टीम ने आम जानकारी के लिए लिखा है, निवेश या टैक्स की सलाह के तौर पर नहीं. रेट और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए फैसला लेने से पहले लेटेस्ट चेक कर लीजिए. कुछ पुराना लगे तो हमें बताइए. संपर्क