किसी शादी या फैमिली फंक्शन में दस लोगों से पूछ लीजिए कि बचत का पैसा कहां लगाएं, दो गुट बन जाएंगे। घर के बड़े कहेंगे FD करा लो या पोस्ट ऑफिस में डाल दो, बैंक ने आज तक धोखा नहीं दिया। बेंगलुरु में नौकरी करने वाला कजिन कहेगा SIP करो, "FD तो महंगाई को भी नहीं हरा पाती"। दोनों की बात में दम है, पर पूरी बात किसी के पास नहीं। असली जवाब तीन चीजों पर टिका है: पैसा कब चाहिए, आप किस टैक्स स्लैब में हैं, और किसी खराब साल में बैलेंस 25% गिर जाए तो आप पर क्या बीतेगी।
तो आराम से समझते हैं: दोनों में कमाई कैसे होती है, क्या गड़बड़ हो सकती है, टैक्स रिटर्न का कितना हिस्सा खा जाता है, और ये सब रुपयों में कैसा दिखता है। नीचे का हर उदाहरण इसी साइट के कैलकुलेटर से निकाला गया है, तो आप अपने नंबर डालकर खुद दोबारा देख सकते हैं।
FD और SIP, सीधी भाषा में
फिक्स्ड डिपॉजिट यानी FD असल में बैंक को दिया गया आपका उधार है। आप मान लीजिए ₹1 लाख पांच साल के लिए बैंक में रखते हैं, बैंक एक ब्याज दर का वादा करता है, और मैच्योरिटी पर पूरा पैसा ब्याज समेत वापस मिल जाता है। ब्याज दर उसी दिन लॉक हो जाती है जिस दिन FD बनती है। उसके बाद दरें ऊपर जाएं या नीचे, आपकी FD पर कोई असर नहीं पड़ता।
SIP (सिस्टेमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) अपने आप में कोई प्रोडक्ट नहीं है। ये म्यूचुअल फंड की यूनिट खरीदने का एक तरीका है: हर महीने तय रकम आपके खाते से कटती है, आमतौर पर सैलरी आने के दो-चार दिन बाद, और उस दिन के भाव पर यूनिट खरीद लेती है। लोग जब "SIP vs FD" बोलते हैं तो लगभग हमेशा उनका मतलब इक्विटी म्यूचुअल फंड की SIP से होता है। यहां भी उसी की बात हो रही है।
बैंक की तरफ से SIP का सबसे करीबी रिश्तेदार है रेकरिंग डिपॉजिट यानी RD: हर महीने तय रकम, तय ब्याज, तय मैच्योरिटी। आगे इन दोनों का सीधा मुकाबला भी करेंगे।
रिटर्न असल में बनता कैसे है
FD का रिटर्न कागज पर लिखा वादा है। बड़े बैंक अभी एक से पांच साल की FD पर सालाना करीब 6–6.5% दे रहे हैं (जैसे SBI में 5–10 साल की FD का कार्ड रेट 6.05% है), और स्मॉल फाइनेंस बैंक 7–8% तक दे देते हैं। सीनियर सिटिजन को आमतौर पर करीब 0.5% ज्यादा मिलता है। ज्यादातर बैंक हर तिमाही ब्याज जोड़ते हैं, इसलिए 6.5% असल में सालाना 6.66% बैठता है। RBI ने अक्टूबर 2026 की पॉलिसी में रेपो रेट बढ़ाया है, तो आने वाले महीनों में FD रेट थोड़े ऊपर जा सकते हैं। FD बुक करने से पहले बैंक का ताजा रेट कार्ड देख लीजिए।
SIP का रिटर्न वही है जो बाजार दे। कोई तय दर नहीं होती। आपकी यूनिट की कीमत, यानी NAV, रोज ऊपर-नीचे होती है। लंबे दौर में भारत के डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड ने अक्सर सालाना 10–12% के आसपास दिया है, लेकिन ये पुराना रिकॉर्ड है, वादा नहीं। ऐसे पांच-पांच साल के दौर भी आए हैं जब रिटर्न इससे काफी कम रहा। यहां के उदाहरणों में 10% और 12% सिर्फ मानकर लिए गए हैं। संभलकर प्लान करना हो तो 10% लेकर चलिए।
| बात | बैंक FD | इक्विटी SIP |
|---|---|---|
| रिटर्न | खोलते वक्त ही तय (अभी बैंक के हिसाब से करीब 6–8%) | बाजार से जुड़ा, तय नहीं; लंबे समय के लिए 10–12% आम तौर पर माना जाता है |
| मूल रकम घट सकती है? | तभी जब बैंक डूबे, और तब भी DICGC ₹5 लाख तक कवर करता है | हां, कम समय में; खराब साल में वैल्यू एक-तिहाई या उससे ज्यादा गिर सकती है |
| पैसा निकालना | कभी भी, समय से पहले तोड़ने पर ब्याज 0.5–1% कम | किसी भी वर्किंग डे; कुछ फंड साल भर के अंदर बेचने पर एग्जिट लोड लेते हैं |
| लॉक-इन | कोई नहीं, बस टैक्स-सेवर FD में 5 साल | कोई नहीं, बस ELSS में हर किस्त पर 3 साल |
| टैक्स | ब्याज पर हर साल आपके स्लैब रेट से | सिर्फ बेचने पर: साल भर तक रखा तो 20%, उसके बाद साल के ₹1.25 लाख से ऊपर के मुनाफे पर 12.5% |
| TDS | एक बैंक से साल का ब्याज ₹50,000 पार होते ही 10% (सीनियर सिटिजन के लिए ₹1 लाख) | रेजिडेंट निवेशकों के मुनाफे पर कोई TDS नहीं |
| किसके लिए ठीक | 1–3 साल में चाहिए पैसा, इमरजेंसी फंड, नियमित आमदनी | 5 साल या उससे ज्यादा दूर के लक्ष्य |
रिस्क: असल में क्या बिगड़ सकता है
FD में सबसे बड़ा रिस्क खुद बैंक है। बड़े बैंक का डूबना बहुत कम होता है, लेकिन को-ऑपरेटिव बैंक और छोटे बैंकों में गड़बड़ी की खबरें आती रहती हैं, और तब पैसा निकालने पर रोक लग जाती है। ऐसे वक्त आपका सहारा डिपॉजिट इंश्योरेंस है। अभी के नियम में DICGC हर बैंक में एक जमाकर्ता के ₹5 लाख तक का बीमा देता है, और इस लिमिट में मूल रकम और ब्याज दोनों मिलाकर गिने जाते हैं। ये कमर्शियल बैंकों (स्मॉल फाइनेंस बैंक भी) और को-ऑपरेटिव बैंकों पर लागू है। लिमिट बढ़ाने की चर्चा चल रही है, तो आपकी रकम इसके आसपास है तो एक बार DICGC की साइट देख लीजिए। सीधी सी बात: स्मॉल फाइनेंस बैंक में 8% के चक्कर में पैसा रख रहे हैं, तो वहां मूल और ब्याज मिलाकर ₹5 लाख से कम रखिए और बाकी अलग-अलग बैंकों में बांट दीजिए।
FD का दूसरा रिस्क चुपचाप वाला है: महंगाई और टैक्स से हार जाना। इस पर नीचे बात करेंगे।
SIP का रिस्क तो हर फंड की फैक्टशीट पर छपा होता है। SEBI के नियम से हर स्कीम को रिस्कोमीटर दिखाना पड़ता है। इसमें Low से लेकर Very High तक छह लेवल होते हैं, हर महीने इसका रिव्यू होता है, और लगभग सारे इक्विटी फंड "Very High" पर ही बैठते हैं। हर विज्ञापन के आखिर में जो लाइन जल्दी-जल्दी पढ़ी जाती है, "म्यूचुअल फंड निवेश बाजार जोखिमों के अधीन हैं", उसका मतलब ठीक यही है: वैल्यू गिर सकती है और नुकसान की भरपाई कोई नहीं करेगा। 2008 में और फिर मार्च 2020 में कुछ ही महीनों के अंदर इक्विटी की वैल्यू एक-तिहाई या उससे ज्यादा गिर गई थी। जिसे उसी साल पैसा चाहिए था, उसे घाटे में बेचना पड़ा।
इक्विटी का रिस्क कम करता है वक्त। एक साल में कुछ भी हो सकता है। दस साल में खराब सालों की भरपाई अब तक अच्छे सालों ने कर दी है, हालांकि पिछला रिकॉर्ड आगे की गारंटी नहीं है। SIP अपने आप में भी थोड़ी मदद करती है, क्योंकि भाव गिरने पर उसी ₹5,000 में ज्यादा यूनिट आती हैं।
जरूरत पर पैसा निकलेगा या नहीं: लिक्विडिटी और लॉक-इन
दोनों में से पैसा निकालना, लोग जितना सोचते हैं, उससे कहीं आसान है।
FD आप लगभग किसी भी दिन तुड़वा सकते हैं। बस पेनल्टी लगती है: ज्यादातर बैंक समय से पहले बंद करने पर ब्याज दर 0.5–1% घटा देते हैं, और दर उतने समय की मिलती है जितने दिन पैसा सच में जमा रहा, उतने की नहीं जितने के लिए बुक किया था। इसका एक बढ़िया जुगाड़ है: बड़ी FD को छोटी-छोटी FD में बांट दीजिए (₹5 लाख की एक FD की जगह ₹1-1 लाख की पांच)। ₹1 लाख चाहिए? एक तोड़िए, बाकी को हाथ मत लगाइए।
हां, टैक्स-सेवर FD की बात अलग है: पूरे पांच साल का पक्का लॉक-इन, न समय से पहले निकासी, न इस पर लोन। 80C की छूट (नए इनकम-टैक्स एक्ट में अब सेक्शन 123) तभी काम आती है जब आप पुरानी रिजीम में हैं, और ब्याज पर टैक्स फिर भी पूरा लगता है।
म्यूचुअल फंड की यूनिट किसी भी वर्किंग डे पर बेच सकते हैं, और पैसा आमतौर पर कुछ वर्किंग डे में बैंक खाते में आ जाता है। कुछ इक्विटी फंड जल्दी बेचने पर एग्जिट लोड लेते हैं, अक्सर पहले साल के अंदर करीब 1%। ये हर फंड में अलग होता है, तो स्कीम की डिटेल पढ़ लीजिए। SEBI की इन्वेस्टर साइट पर एग्जिट लोड आसान भाषा में समझाया गया है।
टैक्स-सेवर FD का इक्विटी वाला भाई है ELSS फंड: तीन साल का लॉक-इन, और पुरानी रिजीम में वही 80C वाली छूट। ELSS में SIP करें तो हर किस्त का लॉक-इन अलग गिना जाता है। जनवरी 2027 की किस्त जनवरी 2030 में खुलेगी, फरवरी वाली फरवरी 2030 में, और ऐसे ही आगे।
SIP में पैसा निकालने की असली दिक्कत नियम नहीं हैं। दिक्कत ये है कि ठीक जिस वक्त आपको पैसा चाहिए, हो सकता है उसी वक्त वो घाटे में चल रहा हो। इसीलिए इमरजेंसी का पैसा इक्विटी में नहीं रखा जाता।
रुपयों में हिसाब: SIP vs RD और लमसम vs FD
हर महीने ₹5,000
मान लीजिए आप हर महीने ₹5,000 बचा सकते हैं। नीचे 6.5% वाली RD के सामने इक्विटी SIP रखी है, एक बार 10% और एक बार 12% रिटर्न मानकर। ये सब टैक्स से पहले के आंकड़े हैं।
| समय | आपने डाले | RD (6.5%) | SIP (10%) | SIP (12%) |
|---|---|---|---|---|
| 5 साल | ₹3,00,000 | ₹3,54,954 | ₹3,90,412 | ₹4,12,432 |
| 10 साल | ₹6,00,000 | ₹8,44,940 | ₹10,32,760 | ₹11,61,695 |
| 15 साल | ₹9,00,000 | ₹15,21,326 | ₹20,89,621 | ₹25,22,880 |
फर्क कैसे बढ़ता है, ये देखिए। पांच साल पर SIP सिर्फ करीब ₹35,000 से ₹57,000 आगे है, जो इतना रिस्क उठाने के बदले कोई खास रकम नहीं। पंद्रह साल पर यही फर्क ₹5.7 लाख से ₹10 लाख हो जाता है। कंपाउंडिंग को वक्त चाहिए, और इक्विटी के लिए पांच साल कम पड़ते हैं।
हर लाइन आप SIP कैलकुलेटर और RD कैलकुलेटर पर खुद जांच सकते हैं। (RD कैलकुलेटर 10 साल तक ही चलता है। इसलिए 15 साल के लिए हमने 10 साल की मैच्योरिटी उसी रेट पर 5 साल की FD में डाल दी और साथ में 5 साल की नई RD जोड़ दी। जवाब वही आता है जो एक लंबी RD का आता।)
पंद्रह साल की बिना रिस्क वाली तुलना करनी हो तो PPF ज्यादा सही बैठता है, जो बैंक या पोस्ट ऑफिस में खुल जाता है। साल के ₹60,000, 7.1% पर 15 साल: PPF कैलकुलेटर पर करीब ₹16.27 लाख बनते हैं, और ये ब्याज पूरा टैक्स-फ्री है।
एक साथ ₹1 लाख
अब मान लीजिए आपके पास ₹1 लाख पड़े हैं, जैसे दिवाली बोनस, और पांच साल तक इनकी जरूरत नहीं है। 6.5% की FD में ये FD कैलकुलेटर के हिसाब से ₹1,38,042 बनते हैं। स्मॉल फाइनेंस बैंक की 7.5% वाली FD ₹1,44,995 देगी। यही रकम एक साथ इक्विटी फंड में डालें और 12% मानें, तो लमसम कैलकुलेटर ₹1,76,234 दिखाता है। 10% पर ₹1,61,051।
यानी टैक्स से पहले इक्विटी वाला रास्ता 6.5% की FD से ₹23,000 से ₹38,000 बेहतर दिखता है। लेकिन एकमुश्त रकम में टाइमिंग का रिस्क है, जो SIP में नहीं होता। पैसा लगाने के अगले ही महीने बाजार 20% गिर गया, तो पांच साल की शुरुआत ही घाटे से होगी। इसलिए बड़ी रकम हो तो कई लोग उसे पहले लिक्विड फंड में रखते हैं और 6–12 महीने में धीरे-धीरे इक्विटी में डालते हैं (इसे STP कहते हैं), एक ही दिन सब झोंक देने के बजाय।
टैक्स: असली फर्क यहीं पड़ता है
SIP vs FD की ज्यादातर तुलनाओं में ये हिस्सा छूट जाता है। आप ऊंचे स्लैब में हैं, तो पूरी तस्वीर ही बदल जाती है।
FD और RD का ब्याज आपकी इनकम में जुड़ता है और उस पर आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है, वो भी हर साल, जैसे-जैसे ब्याज बनता है। क्यूम्युलेटिव FD में भले मैच्योरिटी तक हाथ में कुछ न आए, टैक्स हर साल बनता है। न कोई खास रेट, न कोई छूट। एक बैंक से टैक्स साल में आपका ब्याज ₹50,000 पार करते ही बैंक 10% TDS काट लेता है, सीनियर सिटिजन के लिए ये लिमिट ₹1 लाख है (इनकम-टैक्स एक्ट, 2025 का सेक्शन 393)। PAN न हो तो 20% कटेगा। यहां लोग दो गलतियां करते हैं। पहली, TDS आपका आखिरी टैक्स नहीं है: 30% स्लैब में बैंक 10% काटता है और बाकी आपको ITR भरते वक्त चुकाना होता है। दूसरी, लिमिट से नीचे रहने के लिए FD अलग-अलग बैंकों में बांटने से TDS बचता है, टैक्स नहीं।
अगर साल भर की कुल इनकम पर आपका टैक्स जीरो बनता है, तो बैंक को फॉर्म 121 दे दीजिए, फिर वो TDS नहीं काटेगा। 1 अप्रैल 2026 से इसी फॉर्म ने 15G और 15H की जगह ली है। सीनियर सिटिजन के लिए बस टैक्स जीरो होना काफी है। 60 से कम उम्र वालों का ब्याज और इसी तरह की इनकम भी बेसिक छूट की लिमिट के अंदर होनी चाहिए। पूरी डिटेल इनकम टैक्स डिपार्टमेंट के फॉर्म 121 वाले FAQ में है। ये फॉर्म हर टैक्स साल की शुरुआत में, पहला ब्याज जुड़ने से पहले जमा कर दें। जो TDS कट चुका, वो बैंक वापस नहीं करता। उसे ITR में क्लेम करके वापस लेना पड़ेगा।
इक्विटी म्यूचुअल फंड पर टैक्स सिर्फ बेचते वक्त लगता है, और रेट भी कम हैं। 12 महीने या उससे कम रखा तो शॉर्ट-टर्म गेन, 20% टैक्स। उससे ज्यादा रखा तो लॉन्ग-टर्म गेन, 12.5%, और साल के पहले ₹1.25 लाख के लॉन्ग-टर्म गेन पर कोई टैक्स नहीं (नए एक्ट का सेक्शन 198)। बजट 2026 में इनमें कोई बदलाव नहीं हुआ। ऊपर से 4% सेस, जो हमेशा लगता है। SIP में हर किस्त की होल्डिंग अलग गिनी जाती है। तो दस साल बाद सब एक साथ बेचा, तब भी आखिरी बारह किस्तें शॉर्ट-टर्म ही मानी जाएंगी।
डेट फंड अब टैक्स बचाने वाला FD का ऑप्शन नहीं रहे। 1 अप्रैल 2023 या उसके बाद खरीदी गई यूनिट पर मुनाफा, चाहे कितने भी समय रखा हो, आपके स्लैब रेट से टैक्स होता है, बिल्कुल FD के ब्याज की तरह। फर्क बस इतना बचा है कि टैक्स हर साल नहीं, बेचने पर देना होता है।
₹1 लाख वाले उदाहरण पर इसका असर
मान लीजिए आप 30% स्लैब में हैं (नई रिजीम में ₹24 लाख से ऊपर की इनकम, पुरानी में ₹10 लाख से ऊपर)। सेस मिलाकर FD के ब्याज के हर रुपये पर 31.2% टैक्स जाता है।
| ₹1 लाख, 5 साल, 30% स्लैब | FD (6.5%) | इक्विटी (12% मानकर) |
|---|---|---|
| टैक्स से पहले रकम | ₹1,38,042 | ₹1,76,234 |
| मुनाफा | ₹38,042 | ₹76,234 |
| टैक्स | ₹11,869 (31.2%, हर साल थोड़ा-थोड़ा) | उस साल यही अकेला इक्विटी गेन है तो जीरो (₹1.25 लाख से कम); छूट पहले ही इस्तेमाल हो चुकी है तो 13% पर ₹9,910 |
| हाथ में | ₹1,26,173 | ₹1,76,234 (या ₹1,66,324) |
| 2026 के रुपयों में कीमत, 5% महंगाई पर | ₹98,860 | ₹1,38,084 (जीरो टैक्स वाले केस में) |
सीधे शब्दों में, 30% स्लैब वाले को 6.5% की FD टैक्स के बाद सालाना करीब 4.5% ही देती है। ₹5,000 महीने के 10 साल वाले उदाहरण में भी यही हिसाब है: RD के ₹2,44,940 ब्याज पर ₹76,421 टैक्स जाता है और हाथ में ₹7,68,519 बचते हैं। 12% वाली SIP आखिर में एक साथ बेचें तो करीब ₹57,000 टैक्स बनता है (₹1.25 लाख से ऊपर के लॉन्ग-टर्म गेन पर ₹56,244, और आखिरी साल के शॉर्ट-टर्म गेन पर ₹842), और हाथ में करीब ₹11.05 लाख बचते हैं। बिक्री दो टैक्स सालों में बांट दें, तो ₹1.25 लाख की छूट दो बार मिल जाती है।
कम स्लैब में, या रिबेट के बाद टैक्स जीरो हो, तो FD का ये टैक्स वाला नुकसान काफी हद तक खत्म हो जाता है। आपका ब्याज असल में किस स्लैब में पड़ता है, ये इनकम टैक्स कैलकुलेटर पर देख लीजिए।
महंगाई और असली रिटर्न
MoSPI के CPI आंकड़ों के मुताबिक अगस्त 2026 में खुदरा महंगाई 4.82% रही, और RBI को पूरे साल के लिए 5% से थोड़ा ऊपर का अंदाजा है। लंबी प्लानिंग के लिए ज्यादातर लोग 5–6% मानकर चलते हैं। स्कूल की फीस और दवा-अस्पताल का खर्च जोड़ें, तो आपके घर की अपनी महंगाई अक्सर इससे ज्यादा निकलती है।
"असली" रिटर्न मोटे तौर पर रिटर्न में से महंगाई घटाकर निकलता है। 5% महंगाई के सामने 6.5% की FD टैक्स से पहले करीब 1.5% की असली बढ़त देती है। 30% स्लैब में टैक्स के बाद ये थोड़ी माइनस में चली जाती है। ऊपर वाली टेबल की आखिरी लाइन यही बताती है: ₹1 लाख टैक्स के बाद ₹1,26,173 बनता है, जिससे उतना ही सामान आएगा जितना आज ₹98,860 में आता है। महंगाई 6% लें तो ये करीब ₹94,284 रह जाता है। पैसा घटा नहीं, पर बढ़ा भी नहीं।
लंबे समय के लिए इक्विटी के पक्ष में सबसे मजबूत दलील यही है। FD आपके रुपये तो सुरक्षित रखती है, पर उन रुपयों से कितना खरीदा जा सकेगा, ये हमेशा नहीं बचा पाती। 25 साल दूर रिटायरमेंट जैसे लक्ष्य के लिए ये फर्क बहुत बड़ा हो जाता है। 6% महंगाई में महीने का खर्च कितनी तेजी से बढ़ता है, ये रिटायरमेंट कैलकुलेटर में देखिए।
किसके लिए क्या ठीक है
"कौन सा बेहतर है" वाला सवाल छोड़िए। खुद से पूछिए, "ये पैसा मुझे कब चाहिए?"
- 1–3 साल के अंदर (घर का डाउन पेमेंट, शादी, गाड़ी): FD या RD। जरूरत के वक्त इक्विटी 20% नीचे हो सकती है, और संभलने का समय नहीं मिलेगा।
- 3–5 साल: बीच का मामला। दोनों मिलाकर चलिए, और लक्ष्य जितना पास हो, FD या RD का हिस्सा उतना बड़ा रखिए। ऐसा पांच साल वाला लक्ष्य जिसे आगे खिसका नहीं सकते, उसके लिए पूरा पैसा इक्विटी में मत डालिए।
- 5 साल और उससे आगे (बच्चों की पढ़ाई, रिटायरमेंट): यहां SIP को बेस बनाना ज्यादा समझदारी है। भारी काम वक्त कर देता है।
- इमरजेंसी फंड: हमेशा FD, स्वीप-इन FD या सेविंग्स खाता। कोई भी SIP शुरू करने से पहले करीब छह महीने का खर्च यहां रखिए। नौकरी चली जाए या अस्पताल का बिल आ जाए, तो वो बाजार के संभलने का इंतजार नहीं करेगा।
- बीस-तीस की उम्र, हर महीने सैलरी: लंबे समय का ज्यादातर पैसा SIP में जा सकता है। आपके पास दशकों का समय है, और हर महीने की आमदनी भी, जिसके सहारे खराब साल निकल जाते हैं।
- सीनियर सिटिजन: यहां बढ़त से ज्यादा जरूरी है हर महीने की पक्की आमदनी। ज्यादातर पैसे के लिए FD (सीनियर रेट और ₹1 लाख की TDS लिमिट के साथ) और पोस्ट ऑफिस या बैंक में मिलने वाली सीनियर सिटिजन सेविंग्स स्कीम (अक्टूबर–दिसंबर 2026 के लिए 8.2%) ठीक बैठती हैं। पर रिटायरमेंट 25 साल या उससे लंबा चल सकता है, इसलिए थोड़ा इक्विटी का हिस्सा फंड को बढ़ती कीमतों के साथ चलने में मदद करता है। कुछ रिटायर लोग उस हिस्से से SWP के जरिए पैसा निकालते हैं। ऐसी निकासी कितने साल चलेगी, ये SWP कैलकुलेटर बता देगा।
- कम या जीरो टैक्स स्लैब: आपके लिए FD औसत से बेहतर दिखती है। हां, महंगाई तब भी अपना काम करती है।
दोनों को साथ कैसे चलाएं
ज्यादातर परिवारों के लिए ये "या तो ये, या वो" का मामला नहीं है। पैसा लक्ष्य के हिसाब से बंटता है:
- सबसे पहले इमरजेंसी फंड, FD या स्वीप-इन खाते में। करीब छह महीने का खर्च।
- जो पैसा तीन साल के अंदर चाहिए, वो FD में, या लक्ष्य की तारीख से मेल खाती RD में। 18 महीने बाद किसी चीज के लिए बचा रहे हैं? 18 महीने की RD बढ़िया बैठेगी।
- पांच साल या उससे दूर के लक्ष्यों का पैसा SIP में।
- जब कोई लंबा लक्ष्य दो-तीन साल दूर रह जाए, तो उस पैसे को इक्विटी से FD में थोड़ा-थोड़ा करके शिफ्ट करना शुरू कर दीजिए, ताकि आखिरी वक्त की कोई गिरावट खेल न बिगाड़े।
उदाहरण के लिए, आप हर महीने ₹20,000 बचाते हैं। शुरू में ₹10,000 RD में जाएं, जब तक इमरजेंसी फंड तैयार न हो जाए, और ₹10,000 SIP में। वो पूरा होने के बाद ज्यादातर पैसा SIP में जा सकता है, RD सिर्फ पास वाले लक्ष्यों के लिए।
जो आदत सबसे बड़ा फर्क डालती है, वो है स्टेप-अप SIP: हर साल इंक्रीमेंट के साथ SIP भी बढ़ा दीजिए। ₹5,000 महीना, बिना बढ़ाए, 15 साल, 12% मानकर: ₹25.23 लाख बनते हैं। हर साल 10% बढ़ाते जाएं तो ये ₹43.42 लाख हो जाते हैं। कुल मिलाकर आप ₹19.06 लाख डालते हैं, और आखिरी साल में महीने की SIP करीब ₹18,987 होती है। अप्रेजल के ठीक बाद स्टेप-अप कर दें, तो जेब पर पता भी नहीं चलता।
इन गलतियों से बचें, और फैसले से पहले एक चेकलिस्ट
- पक्के रेट की तुलना सबसे अच्छे केस से करना। FD का 6.5% पक्का है। किसी फंड का "पिछले साल 18%" कोई रेट है ही नहीं। तुलना 10–12% जैसे संभलकर माने गए लंबे समय के रिटर्न से कीजिए, और ये मानकर चलिए कि असल में कम भी आ सकता है।
- बाजार गिरते ही SIP बंद कर देना, या एक साल में ही उसे परख लेना। गिरते महीने में ही आपके पैसे से सबसे ज्यादा यूनिट आती हैं, और इक्विटी के लिए एक लाल साल कुछ नहीं बताता।
- FD का टैक्स भूल जाना। 10% TDS से 30% स्लैब का हिसाब पूरा नहीं होता। बैंक आपका ब्याज टैक्स डिपार्टमेंट को बताते हैं (ये आपके AIS में दिखता है), तो ITR में इसे छोड़ना नोटिस को न्योता देना है।
- इमरजेंसी का पैसा इक्विटी में। या इसका उल्टा: रिटायरमेंट के लिए 20 साल की बचत FD में पड़ी है और चुपचाप महंगाई से हार रही है।
- एक छोटे बैंक में ₹5 लाख से ज्यादा, सिर्फ 1% ज्यादा ब्याज के लिए। बांटकर रखिए।
- "FD से बेहतर" वाले ऑफर। बैंक वाले भैया या एजेंट जो इंश्योरेंस-कम-सेविंग्स प्लान FD के ऑप्शन के तौर पर बेचते हैं, वो अक्सर सुनने में जितने अच्छे लगते हैं, उससे काफी कम देते हैं। असली सालाना रिटर्न (IRR) लिखित में मांगिए।
फैसला करने से पहले
- ये पैसा मुझे ठीक-ठीक कब चाहिए? 3 साल से कम: FD या RD। 5 साल से ज्यादा: SIP।
- क्या मेरे पास छह महीने का खर्च पहले से किसी सुरक्षित और तुरंत निकलने वाली जगह पर रखा है?
- मेरा स्लैब क्या है? 30% पर FD के ब्याज का करीब एक-तिहाई टैक्स में चला जाता है।
- अगले साल ये 25% गिर गया, तो मैं टिका रहूंगा या घबराकर बेच दूंगा?
- क्या किसी एक बैंक में ब्याज मिलाकर मेरे ₹5 लाख से ज्यादा जमा हैं?
- सैलरी बढ़ने पर क्या मैं SIP बढ़ा सकता हूं?
पहले सवाल का जवाब ईमानदारी से दे दिया, तो बाकी अक्सर अपने आप सुलझ जाते हैं।
ये लेख आम जानकारी के लिए है, निजी निवेश सलाह नहीं। यहां इक्विटी के रिटर्न मानकर लिए गए हैं, ये गारंटी नहीं हैं, और FD रेट अक्सर बदलते रहते हैं। ताजा रेट और स्कीम के डॉक्यूमेंट देख लीजिए, और मामला उलझा हुआ हो तो SEBI-रजिस्टर्ड सलाहकार से बात कीजिए।
लोग अक्सर पूछते हैं
SIP अच्छी है या FD?
ये इस पर टिका है कि पैसा कब चाहिए। 5 साल या उससे दूर के लक्ष्य के लिए इक्विटी SIP का FD और महंगाई दोनों से आगे निकलने का चांस अब तक ज्यादा रहा है, पर इसका रिटर्न पक्का नहीं है। जो पैसा 1–3 साल में चाहिए, या आपका इमरजेंसी फंड, उसके लिए FD ज्यादा सुरक्षित है।
₹5000 महीने की SIP 10 साल में कितनी बनेगी, RD से कितना ज्यादा?
दोनों में आप ₹6 लाख डालते हैं। 6.5% की RD से करीब ₹8.45 लाख बनते हैं। SIP में 12% सालाना मानें तो करीब ₹11.62 लाख, और 10% पर करीब ₹10.33 लाख। SIP वाले आंकड़े अंदाजा हैं, गारंटी नहीं।
FD के ब्याज पर टैक्स कितना लगता है और SIP के मुनाफे पर कितना?
FD के ब्याज पर हर साल आपके स्लैब रेट से टैक्स लगता है, और एक बैंक से साल का ब्याज ₹50,000 पार होते ही बैंक 10% TDS काटता है (सीनियर सिटिजन के लिए ₹1 लाख)। इक्विटी फंड पर टैक्स सिर्फ बेचने पर लगता है: 12 महीने या उससे कम रखा तो 20%, उसके बाद साल के ₹1.25 लाख से ऊपर के लॉन्ग-टर्म गेन पर 12.5%, और ऊपर से 4% सेस।
बैंक डूब जाए तो FD का पैसा वापस मिलेगा?
DICGC हर बैंक में एक जमाकर्ता के ₹5 लाख तक का बीमा देता है, और इसमें मूल रकम और ब्याज दोनों मिलाकर गिने जाते हैं। ये कमर्शियल बैंकों (स्मॉल फाइनेंस बैंक भी) और को-ऑपरेटिव बैंकों पर लागू है। बड़ी रकम हो तो उसे अलग-अलग बैंकों में बांटकर रखिए।
15G 15H बंद हो गए, अब FD पर TDS रोकने के लिए कौन सा फॉर्म भरें?
फॉर्म 121। 1 अप्रैल 2026 से इसने 15G और 15H की जगह ली है। ये तभी जमा कर सकते हैं जब साल का आपका टैक्स जीरो बनता हो; 60 से कम उम्र है तो ब्याज और इसी तरह की इनकम भी बेसिक छूट की लिमिट के अंदर होनी चाहिए। हर टैक्स साल की शुरुआत में बैंक को दे दीजिए।
SIP या FD का पैसा कभी भी निकाल सकते हैं?
ज्यादातर हां। FD समय से पहले तोड़ने पर आमतौर पर ब्याज दर 0.5–1% कम हो जाती है, और टैक्स-सेवर FD 5 साल तक टूटती ही नहीं। म्यूचुअल फंड की यूनिट किसी भी वर्किंग डे बेच सकते हैं, हालांकि कुछ इक्विटी फंड पहले साल में एग्जिट लोड (अक्सर करीब 1%) लेते हैं, और ELSS में हर किस्त पर 3 साल का लॉक-इन होता है।
यह लेख Gainly टीम ने आम जानकारी के लिए लिखा है, निवेश या टैक्स की सलाह के तौर पर नहीं. रेट और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए फैसला लेने से पहले लेटेस्ट चेक कर लीजिए. कुछ पुराना लगे तो हमें बताइए. संपर्क