हर दिवाली शोरूम भर जाते हैं और सेल्समैन की लाइन तैयार रहती है: "सर, EMI सिर्फ ₹16,000 है, पता भी नहीं चलेगा।" वो ये नहीं बताता कि EMI सात साल चलेगी, पहले ही साल में गाड़ी की कीमत 15–20% गिर जाएगी, और पेट्रोल, इंश्योरेंस, सर्विस का खर्च अलग से आएगा। ऐसे ही बहुत सी सैलरी वाली फैमिली के पास वो गाड़ी आ जाती है जो पार्किंग में शानदार दिखती है और चुपचाप सैलरी का चौथाई हिस्सा खा जाती है।
20/4/10 रूल इसी से बचाने वाला एक सीधा सा फिल्टर है। ये कोई कानून नहीं है और भारत के लिए एकदम फिट भी नहीं, पर साइन करने से पहले आपके हाथ में एक नंबर तो आ जाता है जिस पर बहस हो सके। नीचे इसे ₹50,000, ₹1 लाख और ₹2 लाख महीने की सैलरी पर चलाकर देखेंगे, और फिर देखेंगे कि रूल को कहां ढीला किया जा सकता है।
20, 4 और 10: कौन सा नंबर किस चीज के लिए
तीन नंबर, डील के हर हिस्से के लिए एक:
- 20: ऑन-रोड कीमत का कम से कम 20% डाउन पेमेंट अपनी बचत से दीजिए।
- 4: लोन ज्यादा से ज्यादा 4 साल का लीजिए।
- 10: गाड़ी का कुल महीने का खर्च आपकी महीने की इनकम के 10% से कम रखिए। "कुल" मतलब EMI के साथ पेट्रोल, इंश्योरेंस, सर्विस, पार्किंग और टोल भी, सिर्फ EMI नहीं।
ये रूल अमेरिका की पर्सनल फाइनेंस से आया है, जहां इसे ग्रॉस इनकम पर लगाया जाता है। हम यहां इन-हैंड सैलरी ले रहे हैं, क्योंकि EMI असल में उसी से भरी जाती है। भारत में ज्यादातर लोग 10% वाली लिमिट सिर्फ EMI पर लगाते हैं और बाकी खर्च को घर का खर्च मान लेते हैं। हम दोनों तरीके दिखाएंगे, क्योंकि दोनों में फर्क बहुत बड़ा है।
हिसाब से पहले एक बात: रूल ऑन-रोड कीमत पर चलता है, विज्ञापन में लिखी एक्स-शोरूम कीमत पर नहीं। रोड टैक्स, रजिस्ट्रेशन और इंश्योरेंस आपके राज्य के हिसाब से अच्छा-खासा ऊपर जोड़ देते हैं, और डाउन पेमेंट व लोन दोनों इसी बड़े नंबर पर बनते हैं।
20% ही क्यों, 4 साल ही क्यों, 10% ही क्यों
20% डाउन पेमेंट का असली कारण है डेप्रिसिएशन, यानी गाड़ी की घटती कीमत। इंश्योरेंस कंपनियां गाड़ी की वैल्यू एक तय टेबल से लगाती हैं: छह महीने से एक साल में शोरूम कीमत से 15% कम, एक से दो साल में 20%, दो से तीन साल में 30%, और पांचवें साल तक 50% (ICICI Lombard पर IDV की ये टेबल देखिए)। कीमत का 90% लोन ले लिया, जो कई लेंडर आराम से दे देते हैं, तो शुरू के कुछ साल आप पर गाड़ी की कीमत से ज्यादा का कर्ज रहता है। 20% डाउन पेमेंट कुशन का काम करता है और आपको लगभग बराबरी पर रखता है।
4 साल की लिमिट ब्याज की वजह से है, और इसलिए भी कि गाड़ी लोन से पहले बूढ़ी न हो जाए। 9% पर ₹8 लाख के लोन में अवधि का असर देखिए:
| अवधि | EMI | कुल ब्याज |
|---|---|---|
| 3 साल | ₹25,440 | ₹1,15,832 |
| 4 साल | ₹19,908 | ₹1,55,586 |
| 5 साल | ₹16,607 | ₹1,96,401 |
| 7 साल | ₹12,871 | ₹2,81,186 |
4 से 7 साल करने पर EMI करीब ₹7,000 घटती है, पर ब्याज ₹1.26 लाख बढ़ जाता है। और छठे-सातवें साल में आप पूरी EMI उस गाड़ी पर भर रहे होते हैं जिसे नए टायर, नई बैटरी और शायद क्लच चाहिए। ये और आगे की सारी EMI कार लोन EMI कैलकुलेटर से निकाली हैं।
10% की लिमिट बाकी सब चीजों के लिए है। ज्यादातर फैमिली के लिए गाड़ी एक शौक है, निवेश नहीं। किराया या होम लोन की EMI, SIP, स्कूल फीस और मां-बाप का मेडिकल खर्च, सैलरी पर पहला हक इनका है।
गाड़ी चलाने का असली खर्च
EMI चार साल में खत्म हो जाती है। पेट्रोल, इंश्योरेंस और सर्विस नहीं होते। नीचे महीने का मोटा-मोटा हिसाब है, मानकर कि गाड़ी महीने में 750 km चलती है और पेट्रोल ₹105 लीटर है (अक्टूबर 2026 में बड़े शहरों में पेट्रोल करीब ₹102–116 था)। ये हमारे अंदाजे हैं, किसी के कोटेशन नहीं, इसलिए अपने नंबर डालिए।
| हर महीने (अंदाजा) | छोटी हैचबैक | कॉम्पैक्ट SUV / सेडान | बड़ी SUV |
|---|---|---|---|
| पेट्रोल | ₹4,400 (18 km/l) | ₹5,600 (14 km/l) | ₹7,200 (11 km/l) |
| इंश्योरेंस (साल का प्रीमियम ÷ 12) | ₹1,500 | ₹2,500 | ₹4,200 |
| सर्विस और टायर | ₹800 | ₹1,200 | ₹2,000 |
| पार्किंग, FASTag, सफाई | ₹500 | ₹700 | ₹1,000 |
| कुल | ₹7,200 | ₹10,000 | ₹14,400 |
मतलब पूरी तरह चुकाई हुई छोटी हैचबैक को भी सड़क पर रखने में महीने के करीब ₹7,000 लगते हैं। यही नंबर पूरा हिसाब बदल देता है।
₹50,000, ₹1 लाख और ₹2 लाख सैलरी पर कौन सी गाड़ी
नीचे सारे लोन 9% पर 4 साल के हैं, 20% डाउन पेमेंट के साथ। इस रेट पर हर ₹1 लाख के लोन की EMI ₹2,489 बैठती है।
सख्त वाला तरीका: EMI और चलाने का खर्च मिलाकर 10% से कम
| इन-हैंड सैलरी | 10% बजट | चलाने के खर्च के बाद EMI के लिए बचा | कितनी गाड़ी (ऑन-रोड) |
|---|---|---|---|
| ₹50,000 | ₹5,000 | कुछ नहीं (हैचबैक का खर्च ही ₹7,200 है) | नई गाड़ी नहीं |
| ₹1,00,000 | ₹10,000 | ₹2,800 (हैचबैक) | करीब ₹1.4 लाख |
| ₹2,00,000 | ₹20,000 | ₹12,800 (हैचबैक) | करीब ₹6.4 लाख |
सख्त रूल के हिसाब से ₹2 लाख महीना घर ले जाने वाले को ₹6.4 लाख की हैचबैक चलानी चाहिए (₹5.14 लाख लोन, EMI ₹12,791)। जबकि इस सैलरी पर बहुत से लोग ₹15–20 लाख की SUV देख रहे होते हैं। रूल गलत नहीं है। भारत में सैलरी के मुकाबले गाड़ियां महंगी हैं, और सख्त वाला तरीका ये बात सीधे मुंह पर कह देता है।
आम भारतीय तरीका: सिर्फ EMI 10% से कम
| इन-हैंड सैलरी | ज्यादा से ज्यादा EMI (10%) | लोन, 9% पर 4 साल | कितनी गाड़ी (लोन + 20% डाउन) | EMI + चलाने का खर्च |
|---|---|---|---|---|
| ₹50,000 | ₹4,977 | ₹2 लाख | ₹2.5 लाख | करीब ₹12,200 (24%) |
| ₹1,00,000 | ₹9,954 | ₹4 लाख | ₹5 लाख | करीब ₹17,200 (17%) |
| ₹2,00,000 | ₹19,908 | ₹8 लाख | ₹10 लाख | करीब ₹30,000 (15%, कॉम्पैक्ट SUV) |
| ₹3,00,000 | ₹29,862 | ₹12 लाख | ₹15 लाख | करीब ₹44,300 (15%, बड़ी SUV) |
ये तरीका ज्यादा प्रैक्टिकल है, और ज्यादातर फैमिली के लिए हम इसे ही आखिरी हद मानेंगे। मोटा हिसाब: गाड़ी की ऑन-रोड कीमत आपकी महीने की इन-हैंड सैलरी की करीब पांच गुना हो, और उसका 20% बचत से आए।
₹50,000 महीने पर दोनों तरीके एक ही बात कहते हैं: नई गाड़ी आपको दबा देगी। ज्यादातर कैश से ली गई एक अच्छी सेकंड-हैंड गाड़ी, या दो-तीन साल और टू-व्हीलर, समझदारी है। ₹1 लाख पर एंट्री-लेवल छोटी गाड़ी किसी तरह फिट होती है। ₹2 लाख पर ₹10 लाख की गाड़ी आराम से चल जाती है।
रूल तोड़ने का असली हिसाब
अब सबसे आम केस। घर ₹1 लाख आता है, और फैमिली को ₹11.5 लाख ऑन-रोड की कॉम्पैक्ट SUV पसंद आ गई है (मान लीजिए ₹10 लाख एक्स-शोरूम)। डीलर 10% डाउन और 7 साल का लोन ऑफर कर रहा है।
| ₹11.5 लाख की गाड़ी | 10% डाउन, 7 साल | 20% डाउन, 4 साल |
|---|---|---|
| डाउन पेमेंट | ₹1.15 लाख | ₹2.3 लाख |
| लोन | ₹10.35 लाख | ₹9.2 लाख |
| 9% पर EMI | ₹16,652 | ₹22,894 |
| कुल ब्याज | ₹3,63,784 | ₹1,78,923 |
| EMI + ₹10,000 चलाने का खर्च | ₹26,652 (सैलरी का 27%) | ₹32,894 (सैलरी का 33%) |
₹1 लाख पर दोनों में से कोई कॉलम नहीं चलता। 7 साल वाला लोन सिर्फ इसलिए सस्ता दिखता है क्योंकि दर्द लंबा खिंच जाता है: सात साल तक सैलरी का एक चौथाई से ज्यादा गाड़ी पर, और सिर्फ ब्याज ₹3.6 लाख। "सही" 20/4 वाला तरीका तो EMI और भारी कर देता है। यानी रूल कह रहा है कि ये गाड़ी इस सैलरी के लिए बड़ी है, ये नहीं कि लोन लंबा कर लो।
अक्सर फैमिली यहां थोड़ा-थोड़ा करके पहुंचती है। गए थे बेस मॉडल लेने, निकले टॉप वेरिएंट लेकर, क्योंकि "EMI सिर्फ ₹1,800 ज्यादा है"। 48 महीने में ये ₹86,400 है, ब्याज अलग।
फिर आता है "अंडरवॉटर" होना, यानी गाड़ी की कीमत से ज्यादा कर्ज। 7 साल वाले लोन का बचा बैलेंस ₹10 लाख एक्स-शोरूम पर बीमा वैल्यू (IDV) से मिलाइए:
| साल के अंत में | IDV (करीब) | बैलेंस, 7 साल का लोन | बैलेंस, 4 साल का लोन |
|---|---|---|---|
| 1 | ₹8 लाख | ₹9.24 लाख | ₹7.2 लाख |
| 2 | ₹7 लाख | ₹8.02 लाख | ₹5.01 लाख |
| 3 | ₹6 लाख | ₹6.69 लाख | ₹2.62 लाख |
| 4 | ₹5 लाख | ₹5.24 लाख | पूरा चुक गया |
7 साल वाले लोन के दूसरे साल में गाड़ी चोरी हो जाए या पूरी तरह खराब हो जाए, तो इंश्योरेंस करीब ₹7 लाख देगा और बैंक का करीब ₹8 लाख बाकी रहेगा। ट्रांसफर के बाद गाड़ी बेचनी पड़े तो भी कुछ ऐसा ही गैप आता है।
एक छुपा खर्च और है। होम लोन देते समय बैंक आपकी कार की EMI भी गिनते हैं। होम लोन एलिजिबिलिटी कैलकुलेटर पर ₹1 लाख इनकम, 8.5% और 20 साल (इनकम का 50% EMI के लिए) पर करीब ₹57.6 लाख का लोन बनता है। ₹16,652 की कार EMI जोड़िए तो ये करीब ₹38.4 लाख पर आ जाता है। यानी इस साल ली गई गाड़ी दो साल बाद वाले फ्लैट को छोटा कर सकती है।
रूल कहां ढीला हो सकता है, कहां नहीं
असल जिंदगी में रूल को खींचने की कुछ ठीक-ठाक वजहें होती हैं:
- ज्यादा डाउन पेमेंट। ऐसी एक्स्ट्रा बचत है जो किसी और काम के लिए अलग नहीं रखी, तो ज्यादा डाउन देना सबसे साफ तरीका है। ₹1 लाख सैलरी और ₹10,000 की EMI लिमिट पर, ₹4 लाख डाउन और ₹4 लाख लोन से ₹8 लाख की गाड़ी आ जाती है, EMI लिमिट भी नहीं टूटती।
- 4 की जगह 5 साल। वही ₹9,964 की EMI 5 साल में ₹4.8 लाख का लोन उठा लेती है, यानी ₹1 लाख सैलरी पर ₹6 लाख की गाड़ी। गाड़ी 8–10 साल रखनी है तो ठीक है। 7 साल पर हम लाइन खींच देंगे। 5 vs 7 साल के कार लोन वाली पोस्ट में इस पर और बात है।
- न किराया, न कोई और EMI। जो अपने चुकाए हुए फैमिली घर में रहता है और कोई होम लोन नहीं है, वो गाड़ी पर 12–15% आराम से उठा सकता है।
- गाड़ी असली खर्च की जगह ले रही है। अगर अभी कैब और ऑटो पर महीने के ₹6,000 जाते हैं, तो चलाने के खर्च का कुछ हिस्सा नया पैसा नहीं है।
- दो पक्की इनकम। दोनों गिन सकते हैं, बशर्ते कुछ महीने एक सैलरी पर भी EMI भरी जा सके।
और कहां बिल्कुल ढील नहीं: जब डाउन पेमेंट में सारी बचत साफ हो रही है, जब अगले दो-तीन साल में होम लोन लेना है, जब नौकरी नई या डांवाडोल है, या जब EMI को "फिट" करने का अकेला तरीका 10% डाउन और 7 साल का लोन है। ऐसे में रूल अपना काम कर रहा है।
कार लोन रेट, चार्ज और बारीक शर्तें
SBI के कार लोन रेट आपके क्रेडिट स्कोर और अवधि के हिसाब से 8.40% से 9.35% तक हैं, और 5 साल से लंबे लोन थोड़े महंगे हैं (SBI का ऑटो लोन रेट पेज, सितंबर 2026 में अपडेट)। बाकी बड़े बैंक 8–9% के आसपास से शुरू होने वाले रेट दिखाते हैं, पर वो सबसे अच्छे प्रोफाइल को मिलते हैं। डीलर और NBFC के लोन अक्सर महंगे पड़ते हैं। हमने बीच का नंबर 9% लिया है।
साइन करने से पहले ये चीजें देखिए:
- बैंक की लिमिट आपकी लिमिट नहीं है। SBI की न्यू कार लोन स्कीम ऑन-रोड कीमत का 90% तक, 7 साल तक के लिए देती है, और सैलरी वालों के लिए लोन नेट महीने की इनकम का 48 गुना तक जा सकता है। बैंक का काम लोन देना है। आपका काम 10% के अंदर रहना है।
- फ्लैट रेट वाले कोटेशन। "5% फ्लैट" सस्ता लगता है, पर रिड्यूसिंग बैलेंस पर ये करीब 9% बैठता है। ऑफर मिलाने से पहले फ्लैट vs रिड्यूसिंग रेट पढ़ लीजिए।
- की फैक्ट्स स्टेटमेंट (KFS)। अक्टूबर 2024 से रिटेल लोन पर लेंडर को KFS देना जरूरी है, जिसमें फीस मिलाकर साल का पूरा खर्च (APR) लिखा होता है। जो चार्ज KFS में नहीं है, वो बाद में आपकी मर्जी के बिना नहीं जोड़ा जा सकता।
- प्रीपेमेंट चार्ज। RBI के प्रीपेमेंट नियमों के तहत 1 जनवरी 2026 या उसके बाद मंजूर हुए, निजी इस्तेमाल वाले फ्लोटिंग रेट लोन पर ये चार्ज नहीं लग सकता। ज्यादातर कार लोन फिक्स्ड रेट होते हैं, तो लेंडर की अपनी पॉलिसी लागू होती है। वो सैंक्शन लेटर और KFS में लिखी होनी चाहिए, पढ़ लीजिए।
- लोन की रकम में क्या-क्या घुसा है। डीलर को एक्सेसरी और एक्सटेंडेड वारंटी लोन में डाल देना अच्छा लगता है। फिर चार साल सीट कवर पर भी ब्याज भरते रहिए। एक्स्ट्रा चीजें अलग से भरिए, या छोड़ दीजिए।
टैक्स में भी कोई राहत नहीं। सैलरी वाला इंसान अपने इस्तेमाल के लिए गाड़ी ले, तो कार लोन के ब्याज पर कोई टैक्स छूट नहीं मिलती। इलेक्ट्रिक गाड़ी के लोन वाली पुरानी छूट (80EEB) सिर्फ अप्रैल 2019 से मार्च 2023 के बीच मंजूर हुए लोन पर थी। अगर आप सेल्फ-एम्प्लॉयड हैं और गाड़ी बिजनेस में इस्तेमाल होती है, तो ब्याज और डेप्रिसिएशन बिजनेस खर्च में आ सकते हैं, अपने CA से बात कीजिए। GST एक्स-शोरूम कीमत में पहले से जुड़ा होता है: सितंबर 2025 से छोटी गाड़ियों पर 18%, बड़ी गाड़ियों और SUV पर 40%, EV पर 5%। ₹7 लाख की छोटी गाड़ी में करीब ₹1.07 लाख GST है, जैसा GST कैलकुलेटर दिखाता है।
20% डाउन पेमेंट कैसे जोड़ें
अभी डाउन पेमेंट नहीं है, तो आमतौर पर इसका मतलब है कि आप अभी इस गाड़ी के लिए तैयार नहीं हैं। 6.5% की RD में महीने के ₹15,000 डालिए, 12 महीने में ₹1,86,430 और 18 महीने में ₹2,84,250 बन जाएंगे, RD कैलकुलेटर पर देख लीजिए। एक साल में ₹9 लाख की गाड़ी का 20% और डेढ़ साल में ₹14 लाख की गाड़ी का 20% हो जाता है। दिवाली बोनस से ऊपर का हिस्सा भर सकते हैं।
ये EMI की रिहर्सल भी है। अगर महीने के ₹15,000 चुभते हैं, तो साइन करने से पहले ही पता चल जाएगा।
क्या नहीं करना: नौकरी जाने या अस्पताल के खर्च के लिए अलग रखा पैसा डाउन पेमेंट में झोंक देना, या इसके लिए पर्सनल लोन लेना। 11–14% का पर्सनल लोन लेकर डाउन पेमेंट भरना असल में दूसरा कार लोन है, वो भी महंगे रेट पर। पर्सनल लोन EMI कैलकुलेटर पर चलाकर देखिए, आइडिया वहीं खत्म हो जाएगा। पूरा कैश देकर गाड़ी लेने की सोच रहे हैं तो कार लोन vs कैश देखिए।
शोरूम जाने से पहले छोटी सी चेकलिस्ट
- जिस कीमत पर हिसाब लगा रहे हैं, वो ऑन-रोड कीमत है, और उसी वेरिएंट की जो लेना तय किया था?
- क्या उसका कम से कम 20% बचत से दे सकते हैं, डाउन पेमेंट का कोई हिस्सा उधार लिए बिना?
- क्या लोन 4 साल का है, या ज्यादा से ज्यादा 5?
- क्या EMI इन-हैंड सैलरी के 10% से कम है, और EMI व चलाने का खर्च मिलाकर करीब 15–17% से कम?
- क्या जल्दी होम लोन लेना है? अगर हां, तो ये EMI आपकी एलिजिबिलिटी कितनी घटाएगी?
- क्या अपने बैंक का रेट डीलर के ऑफर से, KFS और APR देखकर मिलाया है?
ज्यादातर जवाब हां हैं तो जाइए, गाड़ी का मजा लीजिए। नहीं हैं, तो थोड़ा छोटा मॉडल या एक साल और बचत, इसमें आपका कुछ खास नहीं जाता।
लोग अक्सर पूछते हैं
गाड़ी खरीदने का 20/4/10 रूल क्या है?
ऑन-रोड कीमत का कम से कम 20% डाउन पेमेंट दीजिए, लोन ज्यादा से ज्यादा 4 साल का रखिए, और गाड़ी का महीने का खर्च इनकम के 10% से कम रखिए। सख्त तरीके में इस 10% में EMI के साथ पेट्रोल, इंश्योरेंस और सर्विस भी आते हैं; भारत में ज्यादातर लोग इसे सिर्फ EMI पर लगाते हैं।
₹1 लाख सैलरी में कितनी गाड़ी ले सकते हैं?
₹1 लाख इन-हैंड सैलरी का 10% यानी करीब ₹9,954 की EMI, जो 9% पर 4 साल के लिए ₹4 लाख का लोन उठाती है। 20% डाउन के साथ करीब ₹5 लाख ऑन-रोड की गाड़ी बनती है। छोटी गाड़ी चलाने का खर्च महीने के करीब ₹7,000 अलग से।
₹50,000 सैलरी पर नई गाड़ी लेनी चाहिए?
20/4/10 रूल के हिसाब से ये खिंचाव है। करीब ₹5,000 की EMI लिमिट सिर्फ ₹2 लाख का लोन उठाती है, और छोटी हैचबैक चलाने का खर्च महीने के करीब ₹7,000 है, यानी गाड़ी सैलरी का चौथाई हिस्सा ले जाएगी। ज्यादातर कैश से ली गई अच्छी सेकंड-हैंड गाड़ी, या दो साल रुकना, ज्यादा सुरक्षित है।
7 साल का कार लोन लेना ठीक है?
आमतौर पर नहीं। 9% पर ₹8 लाख का लोन 4 की जगह 7 साल का करें तो EMI करीब ₹7,000 घटती है, पर ब्याज ₹1.26 लाख बढ़ जाता है। कम डाउन पेमेंट के साथ शुरू के सालों में कर्ज गाड़ी की कीमत से ज्यादा रहता है। हम ज्यादा से ज्यादा 5 साल लेंगे।
अभी कार लोन का ब्याज कितना है?
SBI के कार लोन रेट क्रेडिट स्कोर और अवधि के हिसाब से 8.40% से 9.35% हैं (सितंबर 2026), और पूरे लोन में फिक्स्ड रहते हैं। बाकी बड़े बैंक 8–9% के आसपास से शुरू होने वाले रेट दिखाते हैं, डीलर और NBFC के लोन अक्सर महंगे होते हैं। साइन करने से पहले लेंडर का ताजा रेट और की फैक्ट्स स्टेटमेंट देख लीजिए।
कार लोन के ब्याज पर टैक्स छूट मिलती है?
सैलरी वाला इंसान अपने इस्तेमाल के लिए गाड़ी ले तो नहीं। इलेक्ट्रिक गाड़ी के लोन वाली पुरानी छूट (80EEB) सिर्फ अप्रैल 2019 से मार्च 2023 के बीच मंजूर हुए लोन पर थी। सेल्फ-एम्प्लॉयड हैं और गाड़ी बिजनेस में चलती है, तो ब्याज और डेप्रिसिएशन बिजनेस खर्च में आ सकते हैं।
यह लेख Gainly टीम ने आम जानकारी के लिए लिखा है, निवेश या टैक्स की सलाह के तौर पर नहीं. रेट और नियम बदलते रहते हैं, इसलिए फैसला लेने से पहले लेटेस्ट चेक कर लीजिए. कुछ पुराना लगे तो हमें बताइए. संपर्क